जेल की सलाखों के पीछे जगी नई उम्मीद,नशे के खिलाफ जनआंदोलन की बनती तस्वीर

जेल की सलाखों के पीछे जगी नई उम्मीद,नशे के खिलाफ जनआंदोलन की बनती तस्वीर

(संपादकीय लेख : श्रीमती अमृता सहाय की कलम से)

"नशे के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई कानून नहीं,बल्कि जागरूक समाज और बदलती सोच है"

रायपुर/रायगढ़ ।

नशा केवल एक व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि समाज, परिवार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर लगने वाला ऐसा दाग है, जो धीरे-धीरे पूरे सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर देता है। ऐसे समय में जब देश नशे की बढ़ती प्रवृत्ति से जूझ रहा है, रायगढ़ जिला जेल में आयोजित नशामुक्ति कार्यक्रम एक सकारात्मक और प्रेरणादायी पहल के रूप में सामने आया है।

जेल को अक्सर अपराध और सजा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, लेकिन यदि वहीं से सुधार, आत्मचिंतन और नई शुरुआत का संदेश निकले तो यह समाज के लिए बड़ी उपलब्धि है। जिला जेल में बंदियों द्वारा नशामुक्त जीवन की शपथ लेना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह उन लोगों के भीतर जागी नई चेतना का संकेत है, जो जीवन को फिर से बेहतर बनाने का संकल्प ले रहे हैं।

नशे की समस्या केवल कानून या पुलिस की कार्रवाई से समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए सामाजिक जागरूकता, परिवार का सहयोग और सामूहिक जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण हथियार हैं। यही कारण है कि नशा मुक्त भारत अभियान केवल सरकारी कार्यक्रम न होकर एक जनआंदोलन का स्वरूप ले रहा है।

गीत-संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से दिया गया संदेश इस बात का प्रमाण है कि संवेदनशील संवाद और सांस्कृतिक चेतना समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। जब बंदी स्वयं नशे के दुष्परिणामों को समझकर नई जिंदगी की ओर बढ़ने का संकल्प लेते हैं, तो यह समाज के लिए भी उम्मीद की किरण बनता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल सरकारी जिम्मेदारी न माना जाए। परिवार, स्कूल, समाज, धार्मिक संस्थाएं और युवाओं के संगठन मिलकर यदि इस दिशा में काम करें, तो नशामुक्त भारत का सपना साकार हो सकता है।

रायगढ़ की यह पहल बताती है कि बदलाव की शुरुआत कहीं से भी हो सकती है—यहां तक कि जेल की सलाखों के पीछे से भी। जब पश्चाताप संकल्प में बदलता है और संकल्प जनजागरण में, तब समाज में वास्तविक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है।