संपादकीय लेख : योग दिवस पर सियासत,परंपरा बनाम राजनीतिक आरोपों का टकराव : स्वास्थ्य का संदेश या सियासी मंच?
संपादकीय
(संपादक प्रशांत सहाय की कलम से)
21 जून को पूरे देश और विश्व में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस उत्साह के साथ मनाया गया। सरकारी संस्थानों, शैक्षणिक परिसरों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने योग कार्यक्रमों का आयोजन किया। एक ओर जहां योग को स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया गया, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने योग दिवस के सरकारी आयोजनों को लेकर कई सवाल भी उठाए।कांग्रेस के आरोप और सरकार के पक्ष, दोनों लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं, लेकिन योग की मूल भावना राजनीति से ऊपर उठकर समाज को जोड़ने और स्वस्थ बनाने की है। यही भावना योग दिवस की सबसे बड़ी सफलता भी है।
कांग्रेस नेताओं का आरोप रहा कि योग जैसे सार्वभौमिक और गैर-राजनीतिक विषय को सरकार राजनीतिक प्रचार और छवि निर्माण का माध्यम बना रही है। विपक्ष का कहना है कि सरकारी संसाधनों और प्रशासनिक तंत्र का उपयोग किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा या नेतृत्व के प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए। कई स्थानों पर कांग्रेस नेताओं ने कार्यक्रमों में सरकारी खर्च, प्रचार सामग्री और राजनीतिक संदेशों पर आपत्ति भी दर्ज कराई।
वहीं सत्तापक्ष का तर्क है कि योग भारत की प्राचीन परंपरा है, जिसे वैश्विक पहचान दिलाने में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज 21 जून को विश्व के अनेक देशों में योग दिवस मनाया जाता है और यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। सरकार का मानना है कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और मानसिक संतुलन का माध्यम है।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या योग जैसे विषय को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाना चाहिए? योग किसी दल, सरकार या विचारधारा की संपत्ति नहीं है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की वह विरासत है, जो समाज के सभी वर्गों को जोड़ती है। यदि राजनीतिक दल योग को समर्थन देते हैं तो यह स्वागतयोग्य है, लेकिन यदि इसे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विषय बना दिया जाए तो इसका मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर सवाल उठाना है, वहीं सरकार का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम सभी वर्गों की भागीदारी और विश्वास के साथ आयोजित हों। योग दिवस जैसे अवसरों पर राजनीतिक दलों को भी संयम और संतुलन का परिचय देना चाहिए।
आज जब तनाव, अस्वस्थ जीवनशैली और मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, तब योग की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है। ऐसे में योग दिवस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय जनस्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत के उत्सव के रूप में देखा जाना चाहिए।
“योग की भावना समावेश, संतुलन और आत्मानुशासन की है। इसलिए योग दिवस पर राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हो सकते हैं,लेकिन योग की मूल भावना दलगत सीमाओं से ऊपर रहनी चाहिए।”आइये जानते है इस मुद्दे पर क्या कहना है प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस का ?
सत्ता दल भाजपा का पक्ष
● योग भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है, जिसे वैश्विक पहचान दिलाने में भारत सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
● अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिलना भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जाता है।
● योग कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों को स्वस्थ जीवनशैली, मानसिक शांति और फिटनेस के प्रति जागरूक करना है।
● सरकारी संस्थानों में योग आयोजन को जनस्वास्थ्य अभियान का हिस्सा बताया जाता है, न कि राजनीतिक कार्यक्रम।
● भाजपा का कहना है कि योग किसी दल या विचारधारा का नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण का माध्यम है।
विपक्षी दल कांग्रेस का पक्ष
● कांग्रेस का आरोप है कि योग जैसे सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों का राजनीतिक प्रचार के लिए उपयोग नहीं होना चाहिए।
● विपक्ष का कहना है कि सरकारी आयोजनों में किसी एक राजनीतिक नेतृत्व या दल के प्रचार से बचना चाहिए।
● कांग्रेस का तर्क है कि योग सभी नागरिकों का साझा सांस्कृतिक विषय है, इसलिए इसे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से दूर रखा जाना चाहिए।
● कई विपक्षी नेताओं ने सरकारी संसाधनों के उपयोग और कार्यक्रमों के राजनीतिक स्वरूप पर सवाल उठाए हैं।
● कांग्रेस का मानना है कि योग दिवस का उद्देश्य स्वास्थ्य और जनकल्याण होना चाहिए, न कि राजनीतिक संदेश देना।

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