आधी आबादी और उनके राजनैतिक अधिकार

आधी आबादी और उनके राजनैतिक अधिकार

आज आठ मार्च है, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, याने आधी आबादी का जश्न,होना भी चाहिए क्योंकि देश के हर राजनैतिक पार्टी के एजेंडा में महिला सशक्तिकरण प्राथमिकता बन गई है।  पुरुष  सत्तात्मक परिवार के बढ़ते प्रभुत्व के चलते  दुनिया भर में महिलाओं को दिन ब दिन परिवार की प्रतिष्ठा बनाकर उसे चारदीवारी और  फिर दरवाजे के भीतर  सीमित किया जाने लगा। भारत में विदेशी आक्रमण के चलते  भी  महिलाओं को  सुरक्षागत  कारणों से  सार्वजनिक नहीं होने दिया गया।  ये बंदिश सालों साल चलते रही। सीमित सामाजिक और आर्थिक अधिकार के चलते महिलाएं शिक्षा से भी वंचित हो गई। देश दुनियां में कुछ महिलाओं ने आगे बढऩे की कोशिश जरूर की लेकिन जिनकी राजनैतिक सहभागिता याने मतदान का अधिकार ही में मिला। शासक देशों में जिन्हें स्वतंत्र देश कहा जाए वहां महिलाएं आंदोलन का सहारा लेकर आगे बढऩे का जुगत लगाते रही। भारत के संदर्भ में ले तो देश की महिला प्रधानमंत्री के होने के बावजूद सशक्तिकरण  कमजोर ही रहा। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में  प्रधान मंत्री नरसिंहराव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के प्रयास से अन्तर्राष्ट्रीय बेरियर खोले गए और  देश में शिक्षण संस्थाओं में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से  पढ़ाई की बुनियाद रखी गई वह महिला सशक्तिकरण की भी बुनियाद साबित हुई। इसके चलते सबसे बड़ा परिवर्तन लैंगिक आधार पर हुआ। महिला, पुरुषों के लिए कौतूहल के विषय से हट कर समझ के दायरे में आई।सहशिक्षा ने बड़ी भूमिका निभाई  और बीते महज पैंतीस सालों में फिजा ही बदल गई। महिलाएं, शिक्षित होने के क्रम में आगे बढ़ी साथ साथ  रोजगार के क्षेत्र में भी आगे बढ़ी। वेतन के सीमित रहने के बावजूद आर्थिकनिर्भरता ने उनके मनो मस्तिष्क के द्वार खोले। आज देखे तो सेना मे भी उनकी सहभागिता है।उनके लिए  आज की स्थिति में सेना में सीधे पद के लिए एनडीए प्रवेश परीक्षाएं प्रारंभ हो चुकी है। बीते एक दशक में आईएएस के लिए होने वाली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में महिलाओं ने पहले से चार स्थानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। अपनी प्रतिभा के बल पर आज अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर ज्ञान के हर क्षेत्र में बराबरी से पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर आगे बढ़ चुकी है।  राजनीति एक ऐसा क्षेत्र है जहां आज भी महिलाओं की समानता का प्रश्नचिन्ह खड़ा हुआ है। आधी आबादी होने के बावजूद राजनीति में उपस्थिति पूरी दुनियां में सोच का विषय है।  संयुक्त राष्ट्र संघ  में छोटे बड़े देशों की संख्या 193है।इनमें से केवल 24 देशों में सर्वोच्च पद  राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री महिलाएं है। भारत के राष्ट्रपति पद पर द्रौपदी मुर्मू निर्वाचित हुई है।  हिंदुस्तान के संदर्भ में देखे। तो त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था हुई। इसके बाद महिलाओं को लोकसभा में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था 2029 के चुनाव में निर्धारित कर दिया गया है। विधानसभा में अभी इस आरक्षण व्यवस्था का प्रश्न , प्रश्न ही है। आर्थिक आधार पर  महिलाओं को संरक्षित कर वोट बैंक में बदलने की प्रवृत्ति की शुरूआत करने का श्रेय भारतीय जनता पार्टी को जाता है। इससे पहले सरकारें महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से कल्याणकारी योजनाएं चलाया करती थी।इसमें गर्भवती महिला केंद्र बिंदु हुआ करती थी। भारतीय जनता पार्टी ने राशन कार्डों में महिलाओं को मुखिया बनाकर  उनके साथ होने का काम किया। मध्यान्ह भोजन में महिला स्व सहायता समूह को आगे किया। उज्जवला गैस  योजना में उन्हें  लाभान्वित किया।इसके बाद जो ट्रंप कार्ड चलाया वह था उनके खाते में नगद ट्रांसफर का।2023 से लेकर अब तक हुए विधान सभा चुनाव में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान,महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार,में काबिज हुई तो आधी आबादी को आर्थिक आधार पर अपनी तरफ करना था। भाजपा के इतने राज्यों में सफलता का श्रेय अगर किसी को जाना चाहिए तो वह मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जाना चाहिए जिन्होंने पहले रिश्ते में महिलाओं के संतानों को भांजा भांजी बनाकर उनकी  मां के भाई बने और भाई बन बहन की आर्थिक सुरक्षा देने के नाम  पर लाडली बहन योजना को मूर्त रूप दे दिया।इस योजना को छत्तीसगढ़ में परोस कर भाजपा ने कांग्रेस के जबड़े से जीत को निकाल कर सत्तासीन हो गई। महाराष्ट्र में  योजना ने देवेंद्र फडणवीस को प्रचंड बहुमत से मुख्यमंत्री बना दिया। ऐसा नहीं था कि भाजपा विरोधी पार्टियों ने महिलाओं को आर्थिक सुविधा देने के नाम पर कोई कमी की। बिहार में राजग ने साल भर के पैसे मकर संक्रांति में देने का प्रण लिया था लेकिन इस पर बिहार की महिलाओं ने भरोसा नहीं किया। बहरहाल,आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है आज से तीन साल बाद इस देश की 164 लोक सभा  सीट पर महिलाओं का वर्चस्व रहेगा।ये ट्रंप कार्ड भी भाजपा का है ।देखना ये भी होगा कि भाजपा विरोधी पार्टियां आनेवाले लोक सभा चुनाव के लिए क्या रणनीति बनाएगी? भाजपा की अगली रणनीति में विधानसभा सीटों में भी तैंतीस फीसदी आरक्षण का दांव होगा ही।