केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बुधवार को नई दिल्ली में 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन 2026 के पूर्व समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि जो किसान हमेशा राष्ट्र को भोजन उपलब्ध कराता रहा है, वही अब अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता बनकर देश को रोशन भी कर रहा है। उन्होंने कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक किसानों को एक ही भूमि से खाद्यान्न और स्वच्छ ऊर्जा दोनों का उत्पादन करने में सक्षम बना सकती है।
पीएम-कुसुम के अगले चरण में होगा समर्पित घटक
प्रल्हाद जोशी ने कहा कि पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण में कृषि-वोल्टेइक ऊर्जा के लिए एक समर्पित घटक होगा। इससे किसान खेती के साथ बिजली उत्पादन से भी आय अर्जित कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि इसमें छोटे और सीमांत किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा तथा यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भूमि का स्वामित्व किसान के पास ही रहे।
एक एकड़ जमीन से तीन स्रोतों से आय
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक किसान एक ही एकड़ भूमि से तीन स्रोतों से आय अर्जित कर सकता है—फसल की बिक्री, डिस्कॉम को बेची गई बिजली और डीजल पर होने वाली बचत। उन्होंने कहा कि छोटे किसानों के लिए सौर ऊर्जा से होने वाली आय महज अतिरिक्त आमदनी नहीं, बल्कि आय-सुरक्षा का माध्यम है। यह अच्छे और बुरे दोनों समय में नियमित आय का स्रोत बन सकती है।
सीमित भूमि में खेती और सौर ऊर्जा साथ-साथ
जोशी ने कहा कि भारत में दुनिया की करीब 18% आबादी रहती है, जबकि विश्व की कुल भूमि का केवल 2.4% हिस्सा भारत के पास है। देश में 85% से अधिक किसान लघु एवं सीमांत किसान हैं, जो 2 हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं। उन्होंने कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक से फसल और सौर ऊर्जा संयंत्र में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं होगी। एक ही भूमि पर नीचे फसलें उगाई जा सकती हैं और उसके ऊपर स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है।
पिछले साल 55.29 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जुड़ी
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत ने पिछले वर्ष 55.29 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जोड़ी, जो नॉर्वे की 40.6 गीगावाट, स्विट्जरलैंड की करीब 30 गीगावाट, ऑस्ट्रिया की 34 गीगावाट और बेल्जियम की करीब 33 गीगावाट कुल स्थापित बिजली क्षमता से अधिक है।
पीएम-कुसुम के तहत करीब 29 लाख पंप सौर ऊर्जा से संचालित
जोशी ने पीएम-कुसुम योजना के तहत हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 29 लाख पंपों को सौर ऊर्जा से संचालित किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा का योगदान 16.3 गीगावाट रहा। इसमें पीएम-कुसुम योजना से 7.6 गीगावाट और मुख्य रूप से पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत रूफटॉप सौर ऊर्जा से 8.7 गीगावाट ऊर्जा का उत्पादन शामिल है। इससे 56 लाख लाभार्थियों को फायदा मिल रहा है।
फसल और क्षेत्र के अनुसार तकनीक पर शोध जरूरी
केंद्रीय मंत्री ने विभिन्न फसलों, जलवायु परिस्थितियों और क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कृषि-वोल्टेइक तकनीक विकसित करने के लिए अधिक शोध की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने पुणे स्थित बीएआईएफ के ग्रामीण नवाचार केंद्र का उदाहरण देते हुए कहा कि शोधकर्ता 30 फसलों पर 17 सौर प्रणालियों का परीक्षण कर रहे हैं। इससे प्रत्येक कृषि परिस्थिति के लिए फसल, पैनल की ऊंचाई, पैनलों के बीच दूरी, ट्रैकिंग प्रणाली और व्यावसायिक मॉडल के सही संयोजन की जरूरत स्पष्ट होती है।
ट्रैक्टर-हार्वेस्टर के अनुकूल संरचनाओं पर जोर
जोशी ने उद्योग जगत और नवप्रवर्तकों समेत सभी हितधारकों से ऐसी संरचनाएं विकसित करने का आग्रह किया, जिनके बीच ट्रैक्टर और हार्वेस्टर आसानी से चल सकें और जो स्थानीय मौसम की परिस्थितियों का सामना कर सकें। उन्होंने आईसीएआर, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से फसल और क्षेत्रवार डेटा संकलन पर भी जोर दिया। इसके अलावा पारंपरिक सौर ऊर्जा की तुलना में लागत अंतर कम करने के लिए संरचनाओं, सामग्रियों और माउंटिंग सिस्टम में नवाचार की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि भारत ग्राम स्तर पर कौशल विकास कर रहा है और करीब 70,000 सूर्य मित्रों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
ग्लोबल साउथ के लिए भारत का अनुभव उपयोगी
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक में भारत का अनुभव ग्लोबल साउथ के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक हो सकता है। इन देशों में किसानों के पास छोटे खेत हैं, पर्याप्त धूप उपलब्ध है और बिजली ग्रिड अभी विकास के दौर में हैं। उन्होंने कहा कि भारत का व्यापक कृषि क्षेत्र किफायती और व्यावहारिक समाधान विकसित करने का अवसर देता है, जिन्हें ग्लोबल साउथ के अन्य देशों में भी अपनाया जा सकता है।
एग्रीवोल्टिक्स पिच हब की घोषणा
कार्यक्रम के दौरान जोशी ने 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन 2026 का टीजर जारी करने के साथ सम्मेलन के आधिकारिक लोगो का अनावरण किया। “फार्म टू फोर्क इनोवेशन को बढ़ावा देना” विषय पर आधारित एग्रीवोल्टिक्स पिच हब की भी घोषणा की गई। इसमें नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (एनएसईएफआई) को ज्ञान साझेदार बनाया गया है। फूड, फ्यूल और फाइबर के 3एफ ढांचे पर आधारित यह पिच हब एग्रीवोल्टिक्स के भविष्य में योगदान देने वाले नवोन्मेषी समाधानों को आमंत्रित करेगा।
21 से 23 अक्टूबर तक भारत मंडपम में सम्मेलन
7वां एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन 2026, 21 से 23 अक्टूबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होगा। तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया भर के किसान, नीति निर्माता, शोधकर्ता, उद्योगपति, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल और अन्य हितधारक एग्रीवोल्टिक्स के भविष्य पर चर्चा करेंगे और इस क्षेत्र को व्यापक स्तर पर विकसित करने के उपायों पर विचार करेंगे।
वैश्विक साझेदारी और किसान-केंद्रित समाधान पर जोर
सम्मेलन वैश्विक और राष्ट्रीय हितधारकों को अनुभव साझा करने, साझेदारी को बढ़ावा देने तथा कृषि और सौर ऊर्जा के एकीकरण के लिए व्यावहारिक रास्ते तलाशने का मंच प्रदान करेगा। इसका उद्देश्य किसान-केंद्रित, टिकाऊ और व्यापक कृषि-वोल्टेइक समाधानों को आगे बढ़ाना तथा इस क्षेत्र पर वैश्विक चर्चा को आकार देने में भारत की भूमिका को मजबूत करना है। उद्घाटन समारोह में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितधारकों के साथ मंत्रालयों, राज्य विभागों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग जगत के वरिष्ठ अधिकारी एवं प्रतिनिधि मौजूद रहे।

